जिला एक नज़र में

सरयकेला–खरसावाँ, पूर्व में सरायकेला एवं खरसावाँ रियासते संयुक्त रूप से पूर्वी भारत के झारखण्ड राज्य के चौबीस जिला में से एक है. सरायकेला-खरसावाँ का जिला मुख्यालय सरायकेला में अवस्थित है.

इतिहास :-

सरायकेला रियासत की स्थापना सन 1620 में कुंवर विक्रम सिंह प्रथम द्वारा तथा खरसावाँ रियासत कि स्थापना सन 1650 को कुंवर पदम सिंह द्वारा सग गई. देश की आजादी के पश्चात् दोनों ही रियासतों का विलय बिहार राज्य में किया गया तो सरायकेला को अनुमंडल का दर्जा दिया गया. कालांतर में तेरीटोरिज एक्ट के तहत 1950 को चांडिल, नीमडीह तथा तमार के 39 ग्रामों/गावों को इसमें मिला दिया गया.
सन 2000 में सरायकेला तथा खरसावाँ को पश्चिम सिंहभूम से अलग कर झारखण्ड का 24 वाँ जिला सरायकेला-खरसावाँ बनाया गया.

भूगोल:-

जिला का विस्तार पूर्व में 85°30’14” से 86°15’24” अक्षांश तथा उत्तर में 27°29’26” से 23°09’34” देशांतर है. इस जिला का सीमाँए पूर्व में पूर्वी सिंहभूम, दक्षिण में पश्चिम सिंहभूम, उत्तर में पुरुलिया से मिलती है. पूर्व में यह पश्चिम बंगाल से अपनी सीमा साझा करती है. सरायकेला-खरसावाँ जिला में सरायकेला तथा चांडिल नामित दो अनुमंडल तथा कुल नौ प्रखण्ड/अंचल है.
प्रखण्ड का नाम :- सरायकेला, खरसावाँ, गम्हरिया, राजनगर, कुचाई, चांडिल, ईचागढ़, नीमडीह तथा कुकड़ू है. इसका कुल क्षेत्रफल 2724.55 वर्ग कि0मी0 के लगभग है. समुद्र से इसकी ऊंचाई 209 मी0 से लेकर 178 मी0 तक है.

घने जंगल से आच्छादित, पहाड़ो से घिरी, बलखाती नदियों और नालो से षटी सरायकेला खरकाई नदी के तट पर बसा है. यह जिला अपने में एक अति समृद बिरासत को सहेजे काईनाईट, एस्बेस्टस, कवार्ज जैसे बहुमूल्य खनिज से भरा झारखण्ड का एक महत्वपूर्ण जिला है.

जनसांख्यिकी :-

2011 के जनगणना के अनुसार सरायकेला-खरसावाँ जिला की कुल आबादी 063458 है. जिसमे पुरुषो कि संख्या 544411 तथा महिलाओ की संख्या 520323 है. कुल आबादी में से 6123993 साक्षर है. इसका कुल क्षेत्रफल 2724.55 वर्ग कि0मी0 है. जनसंख्या के दृष्टी से यह राज्य का 14 वाँ बडा जिला है. और क्षेत्रफल कि दृष्टी से राज्य का 14 वाँ बड़ा जिला है. जनसंख्या के लिहाज से देश का 424 वाँ बड़ा जिला है. जनसंख्या के हिसाब से राज्य का यह 7वाँ बड़ा जिला है. साक्षरता के हिसाब से यह देश का 418वाँ बड़ा जिला है. इसका साक्षरता दर 68.85 है.

अर्थव्यवस्था/ आर्थिक :-

मूल रूप से कृषि आधारित इस जिले के अंतर्गत आदित्यपुर औधोगिक क्षेत्र भी आता है जो एशिया महादेश के विशालतम औधोगिक क्षेत्रो में से एक है. सरायकेला, राजनगर को जोड़ता तितिरबिला पुल, ईचागढ़ के टिकर नदी पर बना पुल, शंख नदी पर बना नदी पथ इस जिला के विकास के साक्षी है. सुदूर ग्रामीण क्षेत्रो को जिला मुख्यालय तथा प्रखंडो को जोडती सडको का निर्माण हो रहा है. सिंचाई तथा पेयजल कि उपलब्ध हेतु तालाब, तथा डैमो का निर्माण हो रहा है, तथा चापाकल लगाए जा रहा है. पुराने नहरों के नवीनीकरण का कार्य प्रगति पर है. जिला के शैक्षणिक विकास के लिए आयुर्वेदिक कॉलेज, प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज, हॉस्पिटल तथा महिलाओ के लिए आई.टी.आई. संस्थान के स्थापना हेतु योजनाए तैयार कि जा रही है. जिले के आठ/नौ प्रखंडो में नये विकास कार्यक्रमो का शुभारम्भ हो चूका है. सरकार इस जिले को पर्यटन केंद्र घोषित कर चुकी है. ऐसा जिले में स्थित एतिहासिक स्थलों तथा मनोरोम स्थलों को ध्यान में रखते हुए किया गया है. अब वह दिन दूर नही जब सरायकेला-खरसावाँ राज्य का एक महत्वपूर्ण जिला व पर्यटन केंद्र बन जायेगा.

संस्कृति एवं त्यौहार

सरायकेला कि पहचान इसकी विश्वविख्यात छऊ नृत्य के लिए हैं. छऊ एक पारंपरिक नृत्य शैली है जिसमे शास्त्रीय नृत्य तथा यहाँ कि संस्कृति के गूढ़ तत्व निहित है. संगीत व नृत्य के चाहने वालों के लिए यह मक्का के सदृश्य है. सरायकेला छऊ नृत्य कि जननी है. यहाँ कि मिटटी में छऊ कि महक समाई हुई है. यह न सिर्फ भारतीय बल्कि विश्व के कलाप्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करती है, उन्हें सम्मोहित करती है. बिहार का हिस्सा रहते हुए यह क्षेत्र विकास से अछूता रहा लेकिन झारखण्ड के अस्तित्व में आते ही इसे जिला बनाया गया तथा बहुत से विकास योजनाओं कि आधारशिला राखी जा चुकी है.